US-IRAN War Impact on World Market:
हाइलाइट्स
- ईरान को लेकर बढ़ते जियो-पॉलिटिकल तनाव का असर अब ग्लोबल शेयर बाजारों पर साफ दिखाई देने लगा है।
- कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल के बीच अमेरिकी शेयर बाजारों में अस्थिरता बढ़ गई है और डॉव जोन्स व S&P 500 जैसे प्रमुख इंडेक्स दबाव में आ गए हैं।
- निवेशकों को डर है कि अगर संघर्ष लंबा खिंचता है तो ऊर्जा आपूर्ति बाधित हो सकती है, महंगाई फिर बढ़ सकती है और अर्थव्यवस्था की रफ्तार भी धीमी पड़ सकती है।
फिलहाल बाजारों की दिशा काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि यह संघर्ष कितने समय तक चलता है और ग्लोबल ऊर्जा आपूर्ति पर इसका कितना असर पड़ता है। यदि हालात जल्द सामान्य हो जाते हैं तो बाजारों पर इसका असर सीमित रह सकता है, लेकिन अगर ऊर्जा आपूर्ति लंबे समय तक बाधित रहती है तो इसका ग्लोबल अर्थव्यवस्था और शेयर बाजारों पर बड़ा असर पड़ सकता है।
Stock Market Outlook: दुनिया के बाजारों पर कितना असर
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव का असर अब ग्लोबल वित्तीय बाजारों में साफ दिखाई देने लगा है। जैसे-जैसे संघर्ष बढ़ रहा है, कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है और दुनिया भर के शेयर बाजारों में अस्थिरता बढ़ गई है। कई प्रमुख इंडेक्स में गिरावट देखी गई है, जबकि ऊर्जा से जुड़े शेयरों में तेजी आई है।
US Stock Market: अमेरिकी शेयर बाजार में बढ़ी अस्थिरता
ईरान से बढ़ते तनाव के बीच अमेरिकी शेयर बाजारों में तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। हाल ही में डॉव जोन्स और एसएंडपी 500 इंडेक्स में गिरावट आई है, क्योंकि कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़कर ऊंचे स्तर पर पहुंच गई हैं। ईरान पर शुरुआती US-इजराइली हमलों के बाद से अमेरिकी इक्विटीज काफी हद तक स्थिर रही हैं। युद्ध शुरू होने के बाद से Dow इंडस्ट्रियल्स 3% नीचे आया। S&P 500 1.4% नीचे है और इसी समय में Nasdaq कंपोजिट में थोड़ा ही बदलाव हुआ है।
यह मजबूती इस बात की ओर इशारा करती है कि US को होर्मुज की खाड़ी से जल्द ही ऊर्जा सप्लाई बहाल होने की उम्मीद बनी हुई है। ऊर्जा कंपनियों के शेयरों को इससे फायदा मिल सकता है, लेकिन पूरे बाजार पर दबाव बन रहा है। निवेशकों को डर है कि तेल की कीमतें बढ़ने से महंगाई फिर से बढ़ सकती है। अक्सर ऐसे समय में बाजार में ‘sell the build-up, buy the war’ यानी तनाव बढ़ने पर बिकवाली और युद्ध शुरू होने के बाद खरीदारी का पैटर्न देखा जाता है। लेकिन अगर युद्ध लंबे समय तक चलता है तो बाजार के मुनाफे पर असर पड़ सकता है।
बुधवार, 11 मार्च को US स्टॉक्स मिले-जुले रहे क्योंकि इन्वेस्टर्स की नजर ईरान युद्ध के डेवलपमेंट्स पर थी। टेक-हैवी नैस्डैक कंपोजिट फ्लैटलाइन के ठीक ऊपर ट्रेड कर रहा था, जबकि S&P 500 0.1% गिरा। इससे पहले मंगलवार, 10 मार्च के उतार-चढ़ाव वाले सेशन में डॉव जोन्स इंडस्ट्रियल एवरेज 250 पॉइंट्स से ज्यादा गिरा।
अमेरिकी बाजार की गिरावट क्यों जोखिम भरी है?
देखने में अमेरिकी बाजार की ये गिरावट बहुत छोटी और सीमित लगती है, लेकिन आंकड़ों की पड़ताल करें तो मामला इतना हल्का नहीं लगता। अमेरिकी बाजार पिछले 2 हफ्ते से अस्थिर बने हुए हैं। दुनिया की सबसे मजबूत इकोनॉमी कहे जाने वाले देश के शेयर बाजार में ऎसी उथल-पुथल कम ही देखने को मिलती है। पिछले कुछ दिनों से यूएस मार्केट में लगातार अस्थिर ट्रेड हो रहा है और निवेशक और फंड मैनेजर्स इस लंबी अवधि के असमंजस के आदी नहीं हैं।
गल्फ वॉर के झगड़े U.S. मार्केट के लिए बहुत ज़्यादा उतार-चढ़ाव वाले होते हैं, खासकर इसलिए क्योंकि वे सीधे मिडिल ईस्ट की स्टेबिलिटी के लिए खतरा पैदा करते हैं, जो दुनिया भर में तेल सप्लाई का लगभग 20% कंट्रोल करता है। इन सप्लाई में रुकावट से एनर्जी की कीमतें बढ़ जाती हैं, जिससे महंगाई का डर, सेंट्रल बैंक के दखल की संभावना, और होर्मुज स्ट्रेट जैसे जरूरी रुकावटों से शिपिंग का खर्च बढ़ जाता है।
गल्फ इलाके में दुनिया के तेल का एक बड़ा हिस्सा है, और वहां झगड़े अक्सर सप्लाई में रुकावट डालते हैं, जिससे तेल की कीमतों में तुरंत और तेज़ उछाल आता है, जिससे महंगाई और स्टैगफ्लेशन का डर बढ़ सकता है। होर्मुज स्ट्रेट जैसे इलाके में इंफ्रास्ट्रक्चर या शिपिंग पर हमले, सप्लाई में गंभीर रुकावटें पैदा कर सकते हैं।
युद्ध के समय इन्वेस्टर स्टॉक से पैसा निकालकर सोने या बॉन्ड जैसे सुरक्षित एसेट्स की ओर चले जाते हैं, जिससे शॉर्ट-टर्म में तेज से बिकवाली होती है। अगर तेल की ऊंची कीमतें बनी रहती हैं, तो वे फेडरल रिजर्व समेत सेंट्रल बैंकों को इंटरेस्ट रेट पर ‘लंबे समय तक ऊंचा’ रुख बनाए रखने के लिए मजबूर कर सकती हैं, जिससे इक्विटी मार्केट पर दबाव पड़ता है।
ट्रांसपोर्टेशन और कच्चे माल की बढ़ी हुई लागत, साथ ही सप्लाई चेन में संभावित रुकावटें, कॉर्पोरेट प्रॉफिट पर बुरा असर डाल सकती हैं। हालांकि ये युद्ध अक्सर शुरुआती घबराहट पैदा करते हैं, लेकिन पुराने डेटा से पता चलता है कि झगड़े के स्थिर होने या उसका दायरा समझ में आने के बाद मार्केट ठीक हो जाते हैं।
जापानी बाजार का हाल
ईरान-इजराइल संघर्ष के बढ़ने से मार्च 2026 की शुरुआत से जापानी फाइनेंशियल मार्केट पर काफी असर पड़ा है, जिससे स्टॉक्स में भारी बिकवाली हुई, येन में उतार-चढ़ाव आया और एनर्जी की कीमतों में उछाल आया। इस युद्ध ने खासकर एनर्जी पर निर्भर जापानी अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया है, जिसमें निक्केई 225 इंडेक्स में एक साल में सबसे खराब साप्ताहिक गिरावट देखी गई है।
वीकेंड स्ट्राइक के बाद निक्केई 225 खुलने पर 1.35% से 2% तक गिर गया। 11 मार्च, 2026 तक, निक्केई 225 5% से 6% तक गिर गया था, जो तेल की कीमतों में तेजी के कारण लगभग एक साल में इसकी सबसे तेज साप्ताहिक गिरावट थी। हालांकि, बाद के दिनों में कुछ रिकवरी देखी गई।
जापानी येन मजबूत हुआ,और अमेरिकी डॉलर के मुकाबले गिरकर लगभग 158.85 पर आ गया। मजबूती के बावजूद करेंसी बहुत ज्यादा अस्थिर रही। शिपिंग स्टॉक और तेल से जुड़े सेक्टर में उतार-चढ़ाव देखा गया। शिपिंग कंपनियों ने शुरू में कीमतों में संभावित उछाल पर छलांग लगाई। जापानी सरकारी बॉन्ड मजबूत हुए, दो साल की यील्ड 3 बेसिस पॉइंट गिरकर 1.215% हो गई।
हांगकांग के बाजारों का हाल
US-ईरान झगड़े की वजह से मार्च 2026 की शुरुआत में हांगकांग के स्टॉक्स में काफ़ी उतार-चढ़ाव आया। हैंग सेंग इंडेक्स में चार महीनों में सबसे ज़्यादा हफ़्ते की गिरावट (3.3%) दर्ज की गई। मार्केट में भारी बिकवाली का दबाव देखा गया, जो 11 हफ़्ते के सबसे निचले स्तर पर आ गया, फिर कुछ हद तक वापसी हुई क्योंकि निवेशक मौजूदा क्षेत्रीय तनाव के बावजूद बारगेन वाले ट्रेड कर रहे थे।
हैंग सेंग इंडेक्स (HSI) मार्च 2026 के पहले हफ़्ते में 3.3% गिरा, जो नवंबर 2025 के आखिर के बाद सबसे खराब परफॉर्मेंस है। एनर्जी स्टॉक्स में तेल की कीमतों के साथ उतार-चढ़ाव आया, जबकि फाइनेंशियल और प्रॉपर्टी सेक्टर्स में शुरुआत में तेज गिरावट देखी गई। उतार-चढ़ाव के बावजूद, चीनी एसेट्स (HK सहित) ने दूसरे एशियाई साथियों की तुलना में ज्यादा मजबूती दिखाई, जिसका कुछ कारण पॉलिसी सपोर्ट भी था।
चीनी मार्केट पर असर
ईरान संघर्ष के दौरान चीनी मार्केट ने उम्मीद से ज्यादा मजबूती दिखाई है, जो दूसरे एशियाई मार्केट की तुलना में चीनी स्टॉक कम गिरे हैं। शंघाई कम्पोजिट में तेल की बढ़ती कीमतों की वजह से थोड़ी गिरावट आई और ये एक समय पर 1.6% गिर गया। युआन स्थिर रहा है, और CSI 300 में सिर्फ थोड़ी गिरावट आई है।
मजबूत सरकारी सपोर्ट, एनर्जी और पॉलिसी बफर की वजह से चीनी एसेट्स उम्मीद से बेहतर रहे हैं। दुनिया का सबसे बड़ा क्रूड इंपोर्टर होने के नाते, चीन होर्मुज स्ट्रेट से सप्लाई में होने वाली रुकावट से प्रभावित तो हो सकता है, लेकिन बड़े स्ट्रेटेजिक रिजर्व ने वहां की मार्केट को बचाए रखा है।
Indian Stock Market: भारतीय बाजार में हलचल
28 फरवरी, 2026 को ईरान-US-इजराइल का युद्ध छिड़ने के बाद इंडियन स्टॉक मार्केट में बहुत अधिक उतार-चढ़ाव और तेज गिरावट आई है। सेंसेक्स और निफ्टी 50 में 6% से ज्यादा की गिरावट देखी गई है। तेल की बढ़ती कीमतों और विदेशी निवेशकों के पैसे निकलने की वजह से निवेशकों की लगभग ₹31 लाख करोड़ की पूंजी डूब गई।
पेंट, एविएशन और ऑयल रिफाइनर (IOC, BPCL, HPCL) जैसे क्रूड इम्पोर्ट पर बहुत ज्यादा निर्भर सेक्टर्स में काफी गिरावट आई। करेंसी और फॉरेन फ्लो की बात करें तो भारतीय रुपया US डॉलर के मुकाबले 92.35 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर आ गया। फॉरेन इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (FIIs) नेट सेलर रहे हैं, जबकि पैनिक सेलिंग से मार्केट में वोलैटिलिटी बढ़ गई है। फार्मा और बैंकिंग जैसे डिफेंसिव सेक्टर्स ने कुछ हद तक मार्केट को संभाल के रखा है, लेकिन जियोपॉलिटिकल सिचुएशन के ठीक होने तक और वोलैटिलिटी की आशंका है।
ग्लोबल बाजारों में बढ़ी अस्थिरता
पिछले एक सप्ताह में ग्लोबल बाजारों में तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। युद्ध की खबरों के साथ ही कच्चे तेल और गैस की कीमतों में तेज उछाल आया है। इससे निवेशकों में जोखिम लेने की क्षमता कम हुई है और कई बाजारों में बिकवाली बढ़ी है।
मौजूदा स्थिति को देखते हुए तीन बातें सामने निकल रही हैं-
- पॉज़िटिव (Upside) स्थिति
- मध्यम (Moderate) स्थिति
- निगेटिव (Downside) स्थिति
पहला सीन: जल्द खत्म हो सकता है संघर्ष
सबसे अच्छी स्थिति यह मानी जा सकती है कि सैन्य कार्रवाई जल्द खत्म हो जाए और बातचीत के जरिए समाधान निकल आए। अगर ऐसा होता है तो तेल और गैस की आपूर्ति फिर से सामान्य हो सकती है और एनर्जी कीमतें भी युद्ध से पहले के स्तर के करीब लौट सकती हैं।
ऐसी स्थिति में ग्लोबल शेयर बाजारों में तेज रिकवरी देखने को मिल सकती है। इतिहास बताता है कि युद्ध या भू-राजनीतिक तनाव खत्म होते ही इक्विटी बाजार तेजी से उछाल दिखाते हैं।
दूसरा सीन: कई हफ्तों तक जारी रह सकता है तनाव
दूसरे और सबसे ज्यादा संभावित आउटलुक में युद्ध कुछ हफ्तों तक जारी रह सकता है। हो सकता है, इस दौरान तेल की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी रहें, लेकिन ग्लोबल आपूर्ति पूरी तरह बाधित नहीं होगी।
ऐसे माहौल में निवेशक सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर झुक सकते हैं। ऊर्जा और रक्षा से जुड़े शेयर बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं, जबकि एयरलाइंस, ट्रांसपोर्ट और ऊर्जा पर ज्यादा निर्भर उद्योग दबाव में रह सकते हैं।
विशेषज्ञों के मुताबिक इस स्थिति में अमेरिकी शेयर बाजार यूरोप और एशिया के बाजारों से बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं।
तीसरा आउटलुक: लंबा युद्ध और ऊर्जा संकट
सबसे निगेटिव स्थिति तब बनेगी, जब युद्ध लंबे समय तक चलेगा और ग्लोबल ऊर्जा आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित होगी। अगर तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं तो इससे महंगाई बढ़ सकती है। कंपनियों के मुनाफे पर दबाव आ सकता है। उपभोक्ता खर्च घट सकता है।
इन सभी फैक्टर्स के दम पर ग्लोबल अर्थव्यवस्था में मंदी का खतरा बढ़ सकता है। ऐसी स्थिति में दुनिया के शेयर बाजारों में गहरी गिरावट देखने को मिल सकती है।
तेल-गैस की सप्लाई पर सबसे बड़ा खतरा
मध्य पूर्व की स्थिति का सबसे बड़ा असर ऊर्जा बाजार पर पड़ सकता है। खासतौर पर हॉर्मुज जलसंधि (Strait of Hormuz) ग्लोबल तेल सप्लाई के लिए बेहद महत्वपूर्ण मार्ग है। इस रास्ते से दुनिया के लगभग 20% तेल का ट्रांसपोर्टेशन होता है। यहां से करीब 20% LNG की सप्लाई होती है।
अगर इस मार्ग में लंबे समय तक बाधा आती है तो ग्लोबल ऊर्जा कीमतों में भारी उछाल आ सकता है।
ऐसे में एनर्जी इंपोर्ट पर निर्भर देशों पर बुरा असर पड़ सकता है। यूरोप और एशिया के देशों पर इस संकट का असर गहरा हो सकता है। अमेरिका की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है क्योंकि वहां घरेलू ऊर्जा उत्पादन काफी मजबूत है।
हालांकि ग्लोबल तेल कीमतों में बढ़ोतरी का असर अमेरिका पर भी पड़ेगा क्योंकि इससे उपभोक्ता खर्च और इंडस्ट्रियल उत्पादन प्रभावित हो सकता है।
उभरते बाजारों के लिए जोखिम
भारत जैसे उभरते बाजारों के लिए यह संकट ज्यादा जोखिम भरा हो सकता है। ऊर्जा कीमतों में तेजी से करेंसी कमजोर हो सकती है। पूंजी का ऑउटफ्लो बढ़ सकता है और महंगाई तेज हो सकती है
हाल ही में दक्षिण कोरिया के शेयर बाजार में आई तेज गिरावट इस जोखिम का उदाहरण है, जहां ऊर्जा संकट और कमजोर करेंसी के कारण निवेशकों में घबराहट बढ़ गई।
किन सेक्टर्स को मिल सकता है फायदा
इस संकट के बीच कुछ सेक्टर बेहतर परफॉर्म कर सकते हैं –
- ऊर्जा कंपनियां
- रक्षा क्षेत्र की कंपनियां
- इंडस्ट्रियल सेक्टर
- इन्फ्रास्ट्रक्चर कंपनियां
दुनियाभर में रक्षा खर्च बढ़ने और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के लिए डेटा सेंटर निर्माण बढ़ने से इंडस्ट्रियल सेक्टर को भी फायदा मिल सकता है।
अंतरराष्ट्रीय शेयर अब भी आकर्षक
हालांकि मौजूदा संकट के बावजूद जानकार अंतरराष्ट्रीय शेयर बाजारों को लेकर पूरी तरह निराश नहीं हैं। इसके पीछे कुछ प्रमुख कारण हैं – कई देशों में आकर्षक वैल्यूएशन, कंपनियों की कमाई में संभावित तेजी, सेक्टरों का बेहतर संतुलन, डॉलर के कमजोर होने की संभावना। अगर युद्ध जल्द समाप्त हो जाता है तो अंतरराष्ट्रीय शेयर बाजारों में तेज़ उछाल देखने को मिल सकता है।
बाजार पर मुख्य प्रभाव
ऊर्जा कीमतों में तेज उछाल
मध्य पूर्व में तनाव बढ़ने से कच्चे तेल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी हुई है। WTI और ब्रेंट क्रूड दोनों की कीमतें तेजी से ऊपर गई हैं क्योंकि निवेशकों को तेल आपूर्ति में बाधा का डर है।
महंगाई बढ़ने का खतरा
तेल की कीमतें बढ़ने से महंगाई बढ़ सकती है। अगर ऐसा होता है तो अमेरिकी फेडरल रिजर्व ब्याज दरों को कम करने की योजना रोक सकता है या दरें फिर बढ़ा भी सकता है।
अलग-अलग सेक्टर पर असर
ऊर्जा और डिफेंस सेक्टर के शेयरों को इस स्थिति में फायदा मिल सकता है क्योंकि इनकी मांग बढ़ सकती है। वहीं टेक और ग्रोथ कंपनियों के शेयरों पर दबाव आ सकता है क्योंकि बढ़ती ब्याज दरें इन सेक्टरों के लिए नकारात्मक होती हैं।
निवेशकों की बदलती मानसिकता
बाजार में निवेशक लगातार असमंजस में हैं। एक तरफ डर के कारण बिकवाली हो रही है, तो दूसरी तरफ गिरावट पर कुछ निवेशक खरीदारी भी कर रहे हैं।
अर्थव्यवस्था पर असर
अगर यह संघर्ष लंबे समय तक चलता है तो ग्लोबल अर्थव्यवस्था पर असर पड़ सकता है। इससे मंदी का खतरा बढ़ सकता है और कंपनियों की कमाई भी प्रभावित हो सकती है।
निवेशकों के लिए क्या रणनीति हो?
ऐसे समय में निवेशकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वे जल्दबाजी में फैसले न लें। इतिहास बताता है कि भू-राजनीतिक तनाव के दौरान बाजारों में अस्थिरता बढ़ती है, लेकिन स्थिति सामान्य होते ही बाजार तेजी से रिकवरी भी करते हैं।
मार्केट एक्सपर्ट्स के मुताबिक, निवेशकों को घबराकर निवेश रणनीति बदलने से बचना चाहिए। लॉन्ग टर्म के निवेश आउटलुक को बनाए रखना चाहिए। पोर्टफोलियो के डायवर्सिफिकेशन पर ध्यान देना चाहिए।
ईरान से जुड़ा संघर्ष ग्लोबल बाजारों के लिए एक बड़ा जोखिम बन सकता है, खासकर तब जब ऊर्जा सप्लाई लंबे समय तक बाधित होने का खतरा हो। फिलहाल बाजारों की दिशा काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि युद्ध कितने समय तक चलता है और तेल की कीमतें किस स्तर पर स्थिर होती हैं।
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